सैरा नामक लोकगीतों के साथ नाचे जाने के कारण इसका नाम ’सैरा नृत्य’ पड़ा है। इस नृत्य में सैरा गाने वालों के दल, अपने हाथों में लकड़ी के छोटे-छोटे डंडे जो इसी नृत्य के लिये बनाये जाते हैं, लेकर गोलाकार खड़े हो जाते हैं। गीत के साथ ही साथ नृत्य प्रारम्भ होता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने दाँये-बाँयें दोनों ओर से बढ़ने वाले डंडों पर अपने डंडे बजाता है। जो कि चाँचर का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है। दल के सभी व्यक्ति एक साथ कभी जमीन पर झुकते, कभी निहुरते और कभी बैठकर आड़े-तिरछे हो जाते हैं। इस स्थिति में भी उनके डंडों की चोटें एक साथ समान रूप से पड़ती रहती हैं। बरसात के समय सैरा नृत्य बहुत सुहावना लगता है।
कांडरा(लोकनृत्य जो आज लोकनाट्य के रूप में है प्रसिद्ध)
सैरा गीतों के नमूने निम्नवत् है-
1. ’असढ़ा तो लागे रे, असढ़ा तो लागे ओ मोरे प्यारे।
दूब गई हरहाय, बीरन लुवौआ आये नहीं घर चुनरी धरी रंगाय।’
2. ’साहुन सुहानी अरे मुरली बजे, भादों सुहानी मोर।
तिरिया सुहानी जबई लगे, ललुवा झूलै पौंर के दोर।’
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