Bundelkhand Drinking Water Crisis: हम बात कर रहे है बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले की, जहां मानिकपुर तहसील के आने वाले दर्जनों गांव में हमेशा पानी की समस्या बनी रहती है. लेकिन गर्मी की शुरुआत होते ही ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने लगते है. करोड़ों रुपये खर्च कर देने के बाद भी पाठा में यह समस्या पहले की तरह ही मुंह बाये खड़ी है. जैसे-जैसे गर्मी की तपन बढ़ती है यहां ज़्यादातर गांव के जलश्रोत सूख जाते हैं और महिलायें मीलों पैदल चलकर मुश्किलों से भरी गगरी सिर पर रखकर लाती है. महिलाएं पानी को अपने पति (खसम) से भी ज़्यादा मूल्यवान समझती हैं.
चित्रकूट. देश को आजाद हुए कई दशक बीत चुके हैं. सरकार आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर अमृत महोत्सव भी मना रही है, लेकिन बुंदेलखंड में आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी लोग बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हैं. यहां तक कि एक गांव में लड़कों के लिए पानी की समस्या अभिशाप तक बन गई है. पानी की परेशानी ऐसी भयावह है कि गांव में कोई अपनी बेटी का ब्याह तक करना नहीं चाहता. दरअसल, बुंदेलखंड में कई दशकों से पानी की समस्या चली आ रही है. कई सरकारों ने इसके लिए करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाए, लेकिन पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है. सूरज की तपन बढ़ते ही नदी, नाले पोखर और तालाब सूखने लगते हैं और पानी का जलस्तर भी नीचे गिरने लगता है. जिसकी वजह से आम जन मानस के साथ साथ बेजुबान भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने लगते है.
हम बात कर रहे है बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले की, जहां मानिकपुर तहसील के आने वाले दर्जनों गांव में हमेशा पानी की समस्या बनी रहती है. लेकिन गर्मी की शुरुआत होते ही ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने लगते है. करोड़ों रुपये खर्च कर देने के बाद भी पाठा में यह समस्या पहले की तरह ही मुंह बाये खड़ी है. जैसे-जैसे गर्मी की तपन बढ़ती है यहां ज़्यादातर गांव के जलश्रोत सूख जाते हैं और महिलायें मीलों पैदल चलकर मुश्किलों से भरी गगरी सिर पर रखकर लाती है. महिलाएं पानी को अपने पति (खसम) से भी ज़्यादा मूल्यवान समझती हैं. पेयजल का यह संकट एक बार फिर भयावह रुप धारण कर चुका है. गर्मियों में वैसे तो कुएं, तालाब, हैण्डपम्प इत्यादि जो भी पेयजल श्रोत हैं सभी का जलस्तर नीचे चला जाता है और लोग बूंद बूंद पानी के लिए मोहताज हो जाते है.
हम बात कर रहे है बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले की, जहां मानिकपुर तहसील के आने वाले दर्जनों गांव में हमेशा पानी की समस्या बनी रहती है. लेकिन गर्मी की शुरुआत होते ही ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने लगते है. करोड़ों रुपये खर्च कर देने के बाद भी पाठा में यह समस्या पहले की तरह ही मुंह बाये खड़ी है. जैसे-जैसे गर्मी की तपन बढ़ती है यहां ज़्यादातर गांव के जलश्रोत सूख जाते हैं और महिलायें मीलों पैदल चलकर मुश्किलों से भरी गगरी सिर पर रखकर लाती है. महिलाएं पानी को अपने पति (खसम) से भी ज़्यादा मूल्यवान समझती हैं. पेयजल का यह संकट एक बार फिर भयावह रुप धारण कर चुका है. गर्मियों में वैसे तो कुएं, तालाब, हैण्डपम्प इत्यादि जो भी पेयजल श्रोत हैं सभी का जलस्तर नीचे चला जाता है और लोग बूंद बूंद पानी के लिए मोहताज हो जाते है.
ज्अप्रैल खत्म होते ही मई-जून महीने की जैसे शुरुवात होती है वैसे वैसे सभी जल स्रोत सूख जाते है और इस सूरज की इस तपन को सहकर पाठा की महिलायें मीलों पैदल चलकर अपने सर में भारी वजन वाले बर्तन रख कर पानी लाती है. शायद इसीलिये पाठा में कहावत है ‘एक टक सूप - सवा टक मटकी, आग लगे रुखमा ददरी, भौरा तेरा पानी ग़ज़ब करी जाए, गगरी न फूटै, चाहै खसम मर जाय. यह पानी यहां के निवासियों के लिये अमृत के समान होता है. महिलाये तो पानी को पति से भी ज़्यादा मूल्यवान समझती है. चित्रकूट जिले की तहसील मानिकपुर अन्तर्गत में आने वाले जमुनिहाई, गोपीपुर, खिचड़ी, बेलहा,एलाहा, उचाडीह गांव,अमचूर नेरुआ,बहिलपुरवा,जैसे दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीणों को पेयजल संकट की त्रासदी ज़्यादा नजदीक से दिखाई पड़ती है. शायद इसलिए कोई अपनी बेटियों की शादी इस गांव में नहीं करना चाहता है. यही कारण है कि गांव में दर्जनों लड़के शादी की आस में कुंवारे बैठे है कि कब पानी की समस्या खत्म हो और उनकी शादी हो जाये.
अप्रैल खत्म होते ही मई-जून महीने की जैसे शुरुवात होती है वैसे वैसे सभी जल स्रोत सूख जाते है और इस सूरज की इस तपन को सहकर पाठा की महिलायें मीलों पैदल चलकर अपने सर में भारी वजन वाले बर्तन रख कर पानी लाती है. शायद इसीलिये पाठा में कहावत है ‘एक टक सूप - सवा टक मटकी, आग लगे रुखमा ददरी, भौरा तेरा पानी ग़ज़ब करी जाए, गगरी न फूटै, चाहै खसम मर जाय. यह पानी यहां के निवासियों के लिये अमृत के समान होता है. महिलाये तो पानी को पति से भी ज़्यादा मूल्यवान समझती है. चित्रकूट जिले की तहसील मानिकपुर अन्तर्गत में आने वाले जमुनिहाई, गोपीपुर, खिचड़ी, बेलहा,एलाहा, उचाडीह गांव,अमचूर नेरुआ,बहिलपुरवा,जैसे दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीणों को पेयजल संकट की त्रासदी ज़्यादा नजदीक से दिखाई पड़ती है. शायद इसलिए कोई अपनी बेटियों की शादी इस गांव में नहीं करना चाहता है. यही कारण है कि गांव में दर्जनों लड़के शादी की आस में कुंवारे बैठे है कि कब पानी की समस्या खत्म हो और उनकी शादी हो जाये.
ज़्यादातर जलश्रोत सूख जाने की वजह से गर्मियों में पहाड़ों और जंगलों के किनारे बने चोहड़ों से एनकेन प्रकारेण अशुद्ध जल लाकर पीने की विवशता यहां के ग्रामीण की नियति बन चुकी है. रात होते ही ग्रामीणों को सुबह पानी भरने जाने की चिंता सताने लगती है और देर रात उठकर अपनी लड़ी बैल को सजाकर उसमें पानी भरने वाले बर्तन को लेकर निकल पड़ते है. पानी की तलाश में और मीलो दूर जाकर इस दूषित पोखर के पानी से अपने पूरे परिवार की प्यास बुझाते है. आजादी मिलें कई दशक से अधिक का समय व्यतीत हो गया है लेकिन पाठा में बसने वाले कोल आदिवासी आज भी मूलभूत सुविधाओ से वंचित है. आखिर कब ऐसा समय आयेगा जब वर्षों से प्यासी यहां की बंजर जमीनों में फिर से फसलें लहलहा उठेंगी. बामुश्किल पीने के पानी की व्यवस्था करने वाले को नहाने के लिये भी पानी की उपलब्धता होगी, यह यक्ष प्रश्न है?
ज़्यादातर जलश्रोत सूख जाने की वजह से गर्मियों में पहाड़ों और जंगलों के किनारे बने चोहड़ों से एनकेन प्रकारेण अशुद्ध जल लाकर पीने की विवशता यहां के ग्रामीण की नियति बन चुकी है. रात होते ही ग्रामीणों को सुबह पानी भरने जाने की चिंता सताने लगती है और देर रात उठकर अपनी लड़ी बैल को सजाकर उसमें पानी भरने वाले बर्तन को लेकर निकल पड़ते है. पानी की तलाश में और मीलो दूर जाकर इस दूषित पोखर के पानी से अपने पूरे परिवार की प्यास बुझाते है. आजादी मिलें कई दशक से अधिक का समय व्यतीत हो गया है लेकिन पाठा में बसने वाले कोल आदिवासी आज भी मूलभूत सुविधाओ से वंचित है. आखिर कब ऐसा समय आयेगा जब वर्षों से प्यासी यहां की बंजर जमीनों में फिर से फसलें लहलहा उठेंगी. बामुश्किल पीने के पानी की व्यवस्था करने वाले को नहाने के लिये भी पानी की उपलब्धता होगी, यह यक्ष प्रश्न है?
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें पानी के लिए गर्मी के महीने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है. जान जोखिम में डालनी पड़ती है. जंगलों से होकर पानी लेने जाना पड़ता है. उनकी पूरी उम्र बीती जा रही है लेकिन पानी की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. यही वजह है कि उनके गोपी पुर गांव में कोई बेटी की शादी नहीं करना चाहता है और जिनकी शादी हो भी गयी है तो वह लोग इस गांव में शादी करवाकर बेहद पछता रही है. इसीलिए इस गांव में एक सैकड़ा से अधिक कुंवारे लड़के बैठे है जिनकी शादी नहीं हो रही है.
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें पानी के लिए गर्मी के महीने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है. जान जोखिम में डालनी पड़ती है. जंगलों से होकर पानी लेने जाना पड़ता है. उनकी पूरी उम्र बीती जा रही है लेकिन पानी की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. यही वजह है कि उनके गोपी पुर गांव में कोई बेटी की शादी नहीं करना चाहता है और जिनकी शादी हो भी गयी है तो वह लोग इस गांव में शादी करवाकर बेहद पछता रही है. इसीलिए इस गांव में एक सैकड़ा से अधिक कुंवारे लड़के बैठे है जिनकी शादी नहीं हो रही है.
बहरहाल प्रशासनिक अमला पानी का संकट गहराने से अन्जान है. मई का महीना खत्म होने वाला है लेकिन अभी तक प्रशासन ने पानी की किल्लत से निपटने के लिए कोई ठोस नीति तैयारी नहीं है. वहीं मानिकपुर के उप जिलाधिकारी प्रमेश श्रीवास्तव का कहना है कि पानी की समस्या को देखते हुए 18 ग्राम पंचायतों को चिन्हित कर लिया गया है और एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उन समस्याओं को देखा जाता है. हर एक ग्राम पंचायत में एक नोडल अधिकारी की तैनाती की गई है. व्हाट्सएप ग्रुप पर पानी की समस्या की शिकायत मिलते ही नोडल अधिकारी द्वारा उस समस्या का निस्तारण कराया जाता है और प्रत्येक ग्राम पंचायत में टैंकरों के माध्यम से ग्रामीणों तक पानी पहुंचाया जा रहा है. पानी की समस्या को पूरी तरह खत्म करने के लिए सरकार द्वारा हर घर नल हर घर जल परियोजना संचालित की गई है, जिसका धरातल पर निर्माण कार्य चल रहा है. इसके पूरा होते हुए ही ग्रामीणों को पानी की समस्या से निजात मिल जाएगी. वहीं पानी की समस्या को लेकर जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ला का कहना है कि गर्मी के महीनों में शहर से लेकर गांव तक पानी की समस्या की शिकायतें आती हैं. जिससे निपटने के लिए पूरी तैयारी की गई है. टैंकरों के माध्यम से लोगों तक पानी पहुंचाया जा रहा है.
बहरहाल प्रशासनिक अमला पानी का संकट गहराने से अन्जान है. मई का महीना खत्म होने वाला है लेकिन अभी तक प्रशासन ने पानी की किल्लत से निपटने के लिए कोई ठोस नीति तैयारी नहीं है. वहीं मानिकपुर के उप जिलाधिकारी प्रमेश श्रीवास्तव का कहना है कि पानी की समस्या को देखते हुए 18 ग्राम पंचायतों को चिन्हित कर लिया गया है और एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उन समस्याओं को देखा जाता है. हर एक ग्राम पंचायत में एक नोडल अधिकारी की तैनाती की गई है. व्हाट्सएप ग्रुप पर पानी की समस्या की शिकायत मिलते ही नोडल अधिकारी द्वारा उस समस्या का निस्तारण कराया जाता है और प्रत्येक ग्राम पंचायत में टैंकरों के माध्यम से ग्रामीणों तक पानी पहुंचाया जा रहा है. पानी की समस्या को पूरी तरह खत्म करने के लिए सरकार द्वारा हर घर नल हर घर जल परियोजना संचालित की गई है, जिसका धरातल पर निर्माण कार्य चल रहा है. इसके पूरा होते हुए ही ग्रामीणों को पानी की समस्या से निजात मिल जाएगी. वहीं पानी की समस्या को लेकर जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ला का कहना है कि गर्मी के महीनों में शहर से लेकर गांव तक पानी की समस्या की शिकायतें आती हैं. जिससे निपटने के लिए पूरी तैयारी की गई है. टैंकरों के माध्यम से लोगों तक पानी पहुंचाया जा रहा है.

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