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बुंदेलखंड की प्रचलित कहावत का असली अर्थ जानें बड़े ही मजेदार तरीके से - 'खाबे कों मउआ, पैरबे कों अमौआ


 

मउआ मेवा वेर कलेवा गुलगुच बड़ी मिठाई ।

 इतनी चीजें चाहो तो गुड़ाने करौ सगाई ।।

बुंदेलखंड में प्रचलित इस कहावत से यह स्पष्ट है कि किसी दूसरे जनपद की पहचान भोजन से भले ही न बने, पर इस जनपद के एक बहुत बड़े भाग गुड़ाने (गोंडवाने) और समूचे अंचल को महुआ, बेर और गुलगुच (महुए का पका फल) से जाना जाता है । महुआ और बेर इस अंचल के जनपदीय वृक्ष हैं, बहुत ही लोकप्रिय । इसी वजह से महुआ को मेवा, बेर को कलेवा (नाश्ता) और गुलगुच को सर्वोत्तम मिष्टान्न का गौरव मिला है । बुंदेलखंडी गायिका ने अपने प्रियतम के आने का संदेश पाकर महुए भूनकर रख लिए हैं और लटा कूट कर ।   भुने हुए महुओं को कूट कर उनमें गरी, चिरौंजी आदि मेवा मिलाकर छोटी रोटी (कुचैया) की तरह बनाया गया खाद्य 'लटा' कहलाता है, जो इस अंचल का विशिष्ट भोज्य रहा है । नायिका ने ऐसे ही विशिष्ट भोज्य बनाये थे, पर उसके साजन गाँव के पास से निकल गए और उसके घर नहीं आए-

               मउआ मोरें भुँजे धरे हैं, लटा धरे हैं कूट ।

               ग्योंड़े होकें साजन कड़ गये, कौन बात की चूक ।।



इन पंक्तियों में भी महुए को सर्वोपरि महत्त्व मिला है । वैसे तो भोजन को उचित स्थान न देनेवाला व्यक्ति 'पेट भरे से काम गकरिया काऊ की' को ही मानता है, लेकिन आम आदमी की धारणा है-'खाबे कों मउआ, पैरबे कों अमौआ ।'   यदि भोजन में महुआ मिले और वस्र में अमौआ, तो व्यक्ति संतुष्ट रहता है । अमौआ आम के पत्तों से बने रंग में रँगा या आम के रंग का कपड़ा विशेष है । किसी समय अमौआ बहुत प्रचलित रहा होगा और उसमें लोक की रुचि रही होगी, क्योंकि वस्र के चयन में लोकरुचि का हाथ रहता है-'कपड़ा पैरै जग भाता, खाना खैये मन भाता ।' रुचि का ध्यान तो अलग है लोक ने कुछ नियंत्रण और वर्जनाएँ भी स्थिर की हैं । कपड़ों के संबंध में लोकमान्यता है कि 'कपड़ा पैरै तीन बार, बुद्ध-बृहस्पत-सुक्रवार' अर्थात् नया वस्र पहिनने के लिए तीन दिन शुभ हैं । पूस में नया वस्र नहीं पहना जाता । नया वस्र देव या कन्या को स्पर्श कर पहनना चाहिए । ये लोकविश्वास बदलते भी रहते हैं । भोजन के संबंध में भी कुछ लोकमान्यताएँ हैं, उनमें से एक देखें-

               चैत मीठी चीमरी बैसाख मीठो मठा

               जेठ मीठी डोबरी असाढ़ मीठे लटा ।

               सावन मीठी खीर-खाँड़ भादों भुँजे चना ।

               क्वाँर मीठी काँकरी ल्याव कोंरी टोर कें ।

               कातिक मीठी कुदई दही डारो मोर कें ।

               अगहन खाव जूनरी भुर्रा नीबू जोर कें ।                

               पूस मीठी खीचरी गुर डारो फोर कें ।

               माँव मीठे पोंड़ा बेर फागुन होरा बालें ।

               समै-समै की मीठी चीजें सुगर खबैया खाबें ।।

       समय-समय पर भोजन पर नियंत्रण रखने के लिए वर्जनाएँ भी लेकप्रचलित थीं, एक उदाहरण देखें-

               चैतै गुर बैसाखै तेल, जेठै मउआ असाढ़ै बेल ।

               सावन भाजी भादों मही, क्वाँर करेला कातिक दही ।

               अघनै जीरो पूसै धना, माघै मिसरी फागुन चना ।

               इतनी चीजें खैहौ सभी, मरहौ नईं तो परहौ सही ।।

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