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चरुआ – बुन्देली संस्कार पद्धति

बुन्देलखण्ड के संस्कार ,परम्पराएं लोक विज्ञान पर आधारित हैं । संतान के जन्म के बाद प्रसूता को पीने के लिए पानी और भोजन की व्यवस्था आवश्यक होती है । इस लिए प्रसूता के स्वास्थ को ध्यान में रखते हुए बुन्देली संस्कार पद्धति चरुआ धराने की प्रथा प्रचलित है।  सामान्य भोजन और पानी, उसे नहीं दिया जा सकता है। प्रसूता के जीवन का यह संक्रमणकाल है । अशुद्ध जल अथवा भोजन देने से प्रसूता का शरीर अनेक रोगों का घर बन सकता है, यह लोक मान्यता है और वैज्ञानिक तथ्य भी ।


                                      


इस अवसर पर पास-पड़ोस की, घर परिवार की सुहागिन स्त्रियाँ बुलायी जाती हैं । इस अनुष्ठान की प्रमुख होती है प्रसूता की ‘सास’ । वही सर्वप्रथम अच्छा सुन्दर मिट्टी का घड़ा कुम्हार के यहाँ से मँगवाती है । गाँव का कुम्हार मटका लेकर आता है । सास उसे सम्मान के साथ चावल और गुड़ की बटी दक्षिणा के रूप में देती है, जिसे ‘आखौती’ कहा जाता है । घड़ा खूब अच्छी तरह से देखा-परखा जाता है। ध्यान रखा जाता है कि बर्तन अच्छा पका हो, उसमें पकने के दरम्यान लगने वाली ‘कालिख’ न हो ।

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