ललितपुर, जिले के एक किसान की मेहनत उस समय मिट्टी में मिल गई, जब उसने खरीदी गई दवा के भरोसे अपनी फसल बचाने की कोशिश की। खेत में सोयाबीन की फसल लहलहाने की उम्मीद थी, लेकिन दवा के छिড়काव के कुछ ही दिन बाद पौधे सूखने लगे।
किसान ने जब इस नुकसान की शिकायत की, तो उसे मदद के बजाय अपमान का सामना करना पड़ा। यही दर्द आगे चलकर न्याय की लड़ाई में बदल गया।
शिकायत से अदालत तक पहुंचा मामला
फसल खराब होने के बाद किसान ने कई जगह गुहार लगाई। प्रशासनिक स्तर पर भी बात रखी गई, जहाँ विक्रेता को बुलाकर समाधान निकालने की कोशिश हुई। इस दौरान किसान को एक दूसरी दवा दी गई, लेकिन इससे हालात और बिगड़ गए और बची–खुची फसल भी नष्ट हो गई।
किसान ने हार न मानते हुए संबंधित विभागों और बीमा कंपनी तक अपनी बात पहुंचाई, लेकिन कहीं से उसे राहत नहीं मिली। अंततः उसने उपभोक्ता आयोग का दरवाज़ा खटखटाया, जहाँ उसने अपनी पूरी कहानी और नुकसान को विस्तार से रखा।
उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला
सुनवाई के बाद आयोग ने माना कि खेत में हुई बर्बादी गलत दवा के कारण हुई थी। इस आधार पर किसान को मुआवज़ा देने का आदेश सुनाया गया। साथ ही गलत दवा बेचने पर विक्रेता पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है। आयोग ने यह स्पष्ट किया कि उपभोक्ता को धोखे में रखकर सामान बेचना गंभीर लापरवाही है और इसका खामियाज़ा उपभोक्ता को नहीं भुगतना चाहिए।
किसानों के हक़ की जीत
यह फैसला उन किसानों के लिए उम्मीद की किरण है, जो गलत दवाओं, बीजों और उपकरणों के कारण नुकसान झेलते हैं लेकिन आवाज़ उठाने पर भी न्याय नहीं पा पाते। निर्णय यह संदेश देता है कि किसान की मेहनत और हक़ भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना किसी भी उपभोक्ता का अधिकार।
अब उम्मीद है कि ऐसे मामलों में जागरूकता बढ़ेगी और किसान भी गलत उत्पादों के खिलाफ आवाज़ उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।

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