प्रदेश की पारंपरिक कला अब राष्ट्रीय मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की ओर बढ़ रही है। कई प्राचीन शिल्प विधाओं को विशेष पहचान दिलाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इन कला रूपों को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग के लिए पंजीकृत किया गया है। यह कदम न सिर्फ इन कलाओं को कानूनी सुरक्षा देगा, बल्कि इन्हें बाजार में अलग पहचान भी मिलेगी।
प्रदेश में लंबे समय से चली आ रही शिल्प परंपराएं अब आधुनिक दौर की मांगों से जुड़ने लगी हैं। जीआई टैग की पहल इन विधाओं को सिर्फ सांस्कृतिक पहचान ही नहीं, बल्कि नई आर्थिक संभावनाओं से भी जोड़ेगी।
खजुराहो की नक्काशी को मिलेगी वैश्विक चमक
खजुराहो की पत्थर नक्काशी पहले से ही देश–दुनिया में अलग पहचान रखती है। इसकी बारीकी और अनोखी शैली को अब आधिकारिक प्रमाण का अवसर मिल रहा है। जीआई टैग मिलने के बाद इस कला को नकली उत्पादों से सुरक्षा मिलेगी और इससे जुड़े कारीगरों को बड़े बाजार तक पहुंच आसान होगी। पर्यटन, ऑनलाइन बिक्री और कला प्रदर्शनियों में इस पारंपरिक नक्काशी की मांग और बढ़ने की उम्मीद है।
छतरपुर के फर्नीचर को मिलेगी ब्रांड पहचान
छतरपुर का हाथ से बना फर्नीचर पहले से ही अपनी कारीगरी और मजबूती के लिए पहचाना जाता है। जीआई टैग के लिए आवेदन के बाद अब इसे एक नाम और आधिकारिक पहचान मिलेगी। इससे फर्नीचर उद्योग को नया आधार मिलेगा और स्थानीय कारीगरों को बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इस पहचान के बाद यह फर्नीचर एक विशिष्ट ब्रांड के रूप में देशभर में स्थापित हो सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम
जीआई टैग मिलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि प्रदेश की पारंपरिक कला अपनी असली पहचान के साथ सुरक्षित रह सकेगी। जब किसी शिल्प को आधिकारिक प्रमाण मिलता है, तो उसके नकली उत्पाद बाजार से खुद-ब-खुद बाहर होने लगते हैं और असली कारीगरी को सम्मान मिलता है। इसके साथ ही इन कलाओं से जुड़े उत्पाद ऊंचे दाम पर बिकते हैं, जिससे कारीगरों की कमाई बढ़ती है। पहचान मजबूत होने पर कला बाजार, प्रदर्शनियों और विदेशों तक पहुंच के नए रास्ते खुलते हैं। स्थानीय स्तर पर काम करने वाले कलाकार और छोटे उद्यमी आधुनिक कारोबार से जुड़ पाते हैं, जिससे उनका काम और व्यापक होता है। इतना ही नहीं, जिन जगहों की कला को यह पहचान मिलती है, वहां पर्यटन भी बढ़ता है और कला आधारित कारोबार को नया सहारा मिलता है।
संयुक्त प्रयासों से मिली गति
इन पारंपरिक कलाओं को नई पहचान दिलाने की इस पहल में कई संस्थाओं और विशेषज्ञों का योगदान है। अलग–अलग जिलों की कला को संजोने, दस्तावेज़ तैयार करने और आवेदन प्रक्रिया पूरी करने में कई विभागों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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