चित्रकूट के इस गांव में रावण दहन नहीं, बल्कि होती है पूजा, सदियों पुरानी है परंपरा

दशहरे का जिक्र आते ही सबसे पहले रावण दहन की तस्वीर सामने आती है। जगह-जगह पंडाल सजते हैं, रामलीलाएं होती हैं और शाम होते ही रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मनाया जाता है। 


लेकिन चित्रकूट जिले के रैपुरा गांव की परंपरा बिल्कुल उलट है। यहां दशहरे के दिन रावण दहन नहीं होता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है।गांव के बाहर मुख्य सड़क किनारे रावण की लगभग ढाई सौ साल पुरानी प्रतिमा स्थापित है। दशहरे के दिन ग्रामीण सुबह-सुबह यहां पहुंचकर विधिविधान से रावण की पूजा करते हैं। नारियल फोड़ा जाता है, फूल चढ़ाए जाते हैं और उसके ज्ञान व विद्या स्वरूप का सम्मान किया जाता है। ग्रामीण मानते हैं कि वे रावण की अच्छाइयों की पूजा करते हैं, उसकी बुराइयों की नहीं। इसी दिन गांव में रामलीला का मंचन भी होता है, जिसमें केवल प्रतीकात्मक रूप से रावण वध किया जाता है, लेकिन उसकी प्रतिमा को कभी नहीं जलाया जाता।

ग्रामीणों का कहना है कि रावण सिर्फ राक्षस नहीं था, बल्कि एक महान ब्राह्मण, विद्वान और शिवभक्त था, जिसने वेद-पुराणों का गहन अध्ययन किया था। उनकी मान्यता है कि प्रतिमा स्थापित होने के बाद से गांव में सुख-समृद्धि बढ़ी है। यहां के कई लोग बड़े पदों पर सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं और इसे वे रावण के आशीर्वाद का फल मानते हैं।

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