चित्रकूट के रेलवे स्टेशन पर इन दिनों अजीब हालात हैं। रोजाना सफर करने वाले यात्रियों को सुबह-शाम यही सोचकर प्लेटफॉर्म तक आना पड़ रहा है कि शायद उनकी रोज चलने वाली ट्रेन मिल जाए। लेकिन स्टेशन पहुंचते ही उन्हें मायूसी हाथ लगती है। दोहरीकरण के काम के चलते इस रूट की एक महत्वपूर्ण पैसेंजर ट्रेन का संचालन रोक दिया गया है, पर यात्रियों को इसकी सही जानकारी देने वाला कोई नहीं है।
स्टेशन पर ना तो माइक से कोई घोषणा होती है और ना ही कोई कर्मचारी साफ-साफ बताने को तैयार है कि ट्रेन कब चलेगी या नहीं चलेगी। ऐसे में लोग घंटों इंतजार करने के बाद निराश होकर लौट जाते हैं। मजबूरी में कई यात्री बसों से सफर कर रहे हैं, जहां किराया भी ज्यादा देना पड़ता है। सबसे ज्यादा दिक्कत बुजुर्गों और बच्चों को हो रही है, जो ठंड में प्लेटफॉर्म पर इंतजार करते-करते परेशान हो जाते हैं।
घोषणाएं अधूरी,
स्टेशन पर भले ही दूसरी गाड़ियों को लेकर कभी-कभार अनाउंसमेंट सुनाई दे जाता है, लेकिन जिस पैसेंजर ट्रेन पर रोजाना बड़ी संख्या में लोग निर्भर रहते थे, उसके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दी जा रही। इससे यात्रियों में नाराजगी बढ़ रही है। उन्हें लगता है कि रेलवे काम तो कर रहा है, लेकिन लोगों को भरोसे में नहीं ले रहा। कई यात्री बताते हैं कि वे हर दिन उम्मीद में स्टेशन पहुंचते हैं, लेकिन बोर्डों पर भी सही सूचना नहीं मिलती। इससे समय और पैसा दोनों बर्बाद हो जाते हैं। कुछ लोग तो कई किलोमीटर दूर से स्टेशन आते हैं और जानकारी ना मिलने पर वापस लौट जाते हैं।
आसपास के जिलों का भी बिगड़ा सफर
इस रूट से रोज आने-जाने वालों में छात्र, नौकरीपेशा लोग, ग्रामीण और व्यापारी शामिल हैं, जिनका पूरा कार्यक्रम इस ट्रेन पर टिका रहता था। अब उन्हें दूसरे साधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। बसें भी कई बार भरी मिलती हैं, जिससे सफर और मुश्किल हो जाता है।
यात्रियों की मांग है कि रेलवे कम से कम स्टेशन पर स्पष्ट सूचना दे, ताकि उन्हें अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। दोहरीकरण जरूरी है, लेकिन दोहरीकरण के साथ-साथ यात्री सुविधाएं भी जरूरी हैं—यही आवाज अब आम लोगों की बनती जा रही है।

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