राजा भोज: परमार वंश के महान शासक, विद्वान और कला प्रेमी की संपूर्ण जीवनी

महाराजा भोज जीवनी: परमार वंश के महान शासक, विद्वान और निर्माता | Raja Bhoj Biography Hindi 2026
⚜ History · Parmar Dynasty · Raja Bhoj Biography
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⚜ इतिहास
👑 महाराजा भोज — परमार वंश के सर्वश्रेष्ठ शासक (1010-1055 ई.)  •  84 ग्रंथ · 500 विद्वान · 64 सिद्धियां  •  भोपाल के संस्थापक — भोजपाल नगर  •  भोजपुर का अद्वितीय शिव मंदिर  •  भोजशाला — संस्कृत का विश्वविद्यालय  •  समरांगण सूत्रधार में विमान निर्माण का वर्णन  •  ''कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली''  • 
महाराजा भोज की प्रतिमा — भोपाल, मध्यप्रदेश
⚜ परमार वंश · मालवाधिपति

महाराजा भोज ''नवसाहसाक'' — नव विक्रमादित्य

वे योद्धा थे — जिन्होंने महमूद गजनवी को भगाया। वे विद्वान थे — जिन्होंने 84 ग्रंथ लिखे। वे निर्माता थे — जिन्होंने भोपाल बसाया, भोजपुर का अजूबा मंदिर खड़ा किया। ऐसे थे मालवा के महान सम्राट राजा भोज।

जन्म
~980 ई.
शासनकाल
1010-1055 ई.
राजधानी
धार, मालवा
वंश
परमार
ग्रंथ
84 रचनाएं
पत्नी
लीलावती
👑 परमार वंश ⚔️ वीर योद्धा 📜 84 ग्रंथ 🏛️ भोपाल के संस्थापक 🔱 शिव भक्त 🎓 राजसभा में 500 विद्वान
महाराजा भोज — मुख्य तथ्य
45+ वर्ष
शासनकाल
1010 से 1055 ई.
84
ग्रंथ रचना
विभिन्न विषयों पर
500
विद्वान राजसभा में
9 नवरत्न सहित
250 sq mi
भोजताल का क्षेत्रफल
भोपाल के पास

⚔️ साम्राज्य की सीमाएं — भोज का विशाल राज्य

🗺️ परमार साम्राज्य — चरम पर

उत्तर
चित्तौड़गढ़ तक — राजपूतों से लड़े
दक्षिण
ऊपरी कोंकण तक — चालुक्यों से
पश्चिम
साबरमती नदी तक — गुजरात तक
पूर्व
विदिशा तक — कलचुरी से युद्ध
दक्षिण
केरल समुद्र तट — डॉ. रेवा प्रसाद शोध
उत्तर
केदारनाथ तक — 1076-99 पुनर्निर्माण
उदयपुर प्रशस्ति: "कैलाश से लेकर मलाया पहाड़ियों तक और सूर्योदय से सूर्यास्त के पहाड़ों तक पृथ्वी पर शासन किया।" | उपाधियां: परम-भट्टारक · महाराजाधिराज · परमेश्वर · त्रिभुवन नारायण

🏛️ महाराजा भोज की अमर धरोहर

भोजपुर मंदिर — महाराजा भोज द्वारा निर्मित
📸 भोजेश्वर मंदिर, भोजपुर, मध्यप्रदेश — राजा भोज का सबसे प्रसिद्ध निर्माण। दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक। अधूरा लेकिन अद्वितीय।
शिव मंदिर — राजा भोज की शिल्पकला
📸 परमार कालीन शिव मंदिर — राजा भोज की वास्तुकला प्रतिभा का जीवंत उदाहरण। भोज ने अपने शासनकाल में 104 मंदिर बनवाए।

🌟 जन्म और प्रारंभिक जीवन

👑 उज्जैनी में जन्म — विक्रमादित्य का वंशज

महाराजा भोज का जन्म लगभग सन् 980 ईस्वी में महाराजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैनी (उज्जैन) में हुआ था। वे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के वंशज थे। उनके पिता का नाम सिंधुराज और माता का नाम सावित्री था। पंद्रह वर्ष की छोटी आयु में उनका राज्याभिषेक मालवा के राजसिंहासन पर हुआ।

भोज-प्रबंध के अनुसार उनके बाल्यकाल में तीव्र सिरदर्द की समस्या थी। उज्जैन के दो ब्राह्मण सर्जनों ने 'मोह-चूर्ण' नामक बेहोशी की दवा का प्रयोग करके उनकी खोपड़ी की हड्डी खोली, एक ट्यूमर निकाला और 'संजीवनी' पाउडर देकर उन्हें होश में लाया। यह प्राचीन भारत की चिकित्सा विज्ञान की दक्षता का उदाहरण है।

⚔️ चाचा मुंजा की कहानी — मृत्यु का षड्यंत्र और बचाव

पौराणिक वृत्तांतों के अनुसार भोज के चाचा मुंजा ने उनकी हत्या का षड्यंत्र रचा था। उन्होंने वत्सराज को भोज को मारने का आदेश दिया था। लेकिन भोज के शिष्टतापूर्ण भाषण सुनकर वत्सराज का मन बदल गया। उसने भोज की मृत्यु का नाटक रचा और मुंजा को एक श्लोक भेजा जिसमें मंधाता, राम, युधिष्ठिर जैसे महान राजाओं का उदाहरण देकर मुंजा की आंखों में आंसू आ गए। जब मुंजा को पता चला कि भोज जीवित है, तो उसने भोज को दरबार में वापस बुलाया। यह कथा बाद के काव्यकारों की रचना प्रतीत होती है और ऐतिहासिक प्रमाणों से इसकी पुष्टि नहीं होती।

⚔️ सैन्य पराक्रम — चारों ओर विजय

🛡️ चारों दिशाओं में युद्ध

अल्पायु में सिंहासनारोहण के समय भोज चारों ओर से शत्रुओं से घिरे थे। उत्तर में तुर्क, उत्तर-पश्चिम में राजपूत सामंत, दक्षिण में विक्रम चालुक्य, पूर्व में कलचुरी तथा पश्चिम में भीम चालुक्य से उन्हें लोहा लेना पड़ा। उन्होंने सब को हराया। तेलंगाना के तेलप और तिरहुत के गांगेयदेव को हराने से प्रसिद्ध कहावत बनी — "कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली।"

🏹 महमूद गजनवी से बदला — सोमनाथ का प्रतिशोध

जब महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर का ध्वंस किया, तो शैव भक्त राजा भोज ने क्षुब्ध होकर 1026 में गजनवी पर हमला किया और उसे सिंध के रेगिस्तान में भगा दिया। इसके बाद भोज ने हिंदू राजाओं की संयुक्त सेना एकत्रित करके गजनवी के पुत्र सालार मसूद को बहराइच के पास एक मास के युद्ध में मारकर सोमनाथ का बदला लिया।

📜 84 ग्रंथों की अद्भुत रचना

🏗️
समरांगण सूत्रधार
वास्तुकला, मंदिर निर्माण, विमान बनाने की विधि
📖
सरस्वती कंठाभरण
संस्कृत व्याकरण और काव्यशास्त्र का महान ग्रंथ
🧘
राजमार्तंड
पतंजलि योग सूत्रों पर विस्तृत टीका — ध्यान विधियां
🌿
आयुर्वेद सर्वस्व
चिकित्सा, श्रृंगार प्रकाश — स्वास्थ्य और सौंदर्य
🚢
युक्ति कल्पतरु
जहाज निर्माण, नगर-निर्माण, रत्न-परीक्षण
📐
तत्त्वप्रकाश
शैव दर्शन — सिद्धांत तंत्रों का महान संश्लेषण
🎭
श्रृंगार प्रकाश
काव्यशास्त्र और नाट्यकला — व्यक्तिगत रूप से रचित
🏇
शालिहोत्र
घोड़ों के रोग और उपचार — पशु चिकित्सा विज्ञान
"

महाराजा भोज ने विमान बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन अपने ग्रंथों में किया है। इसी तरह उन्होंने नाव व बड़े जहाज बनाने की विधि का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने रोबोट तकनीक पर भी काम किया था। आईन-ए-अकबरी के अनुसार उनकी राजसभा में 500 विद्वान थे।

ऐतिहासिक स्रोत — आईन-ए-अकबरी, अजदा का भोज संदर्भ

🏛️ भोज के अमर निर्माण कार्य

🌊 भोजपुर नगर और विशाल सरोवर

राजा भोज ने भोपाल से 32 किमी दूर भोजपुर नगर की स्थापना की और वहाँ एक 250 वर्ग मील से भी अधिक विस्तृत विशाल सरोवर का निर्माण कराया। यह मानव निर्मित जलाशय बेतवा, कालियासोत और अन्य नदियों को तीन बांधों से जोड़कर बनाया गया था। यह 15वीं शताब्दी तक विद्यमान रहा, जब होशंग शाह ने दो बांधों को तोड़ दिया। भोज ने 9 नदियों और 98 धाराओं के प्रवाह को रोककर इस अद्वितीय इंजीनियरिंग कार्य को अंजाम दिया था।

⛩️ भोजेश्वर शिव मंदिर — अधूरा लेकिन महान

1026 से 1054 ई. के बीच बना भोजपुर का शिव मंदिर भोज की वास्तुकला प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक स्थापित है। इसे 'मालवा का सोमनाथ' कहा जाता है। यद्यपि मंदिर अधूरा है, फिर भी यह UNESCO की दृष्टि से महत्वपूर्ण धरोहर है।

📚 भोजशाला — संस्कृत विश्वविद्यालय

धार में स्थित भोजशाला राजा भोज द्वारा स्थापित विश्वविख्यात संस्कृत शिक्षा केंद्र था। यहाँ माँ वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति स्थापित थी जो अब ब्रिटेन के म्यूजियम में है। तक्षशिला और नालंदा के बाद भोजशाला का नाम आता है। ज्ञानपीठ पुरस्कार के चिह्न को भोजशाला की माँ वाग्देवी से लिया गया है।

📅 राजा भोज का जीवन — Timeline

980
~980 ई.
जन्म — उज्जैनी में विक्रमादित्य के वंश में
पिता: सिंधुराज। माता: सावित्री। बचपन में उच्च शिक्षा। बाल्यकाल में ट्यूमर की सफल शल्य चिकित्सा।
995
~995 ई.
15 वर्ष की आयु में राज्याभिषेक — मालवा का सिंहासन
पिता सिंधुराज की मृत्यु के बाद परमार वंश का सिंहासन। चारों दिशाओं में शत्रु — सबको हराया।
1018
~1018 ई.
लाता (गुजरात) और कोंकण पर विजय
भोज का पहला बड़ा सैन्य अभियान। लाता के चालुक्यों को अधीन किया। 1020 में 'कोंकण-ग्रहण विजय पर्व' आयोजन।
1026
1026 ई.
महमूद गजनवी पर हमला — सोमनाथ का बदला
महमूद गजनवी को सिंध के रेगिस्तान में भगाया। हिंदू राजाओं की संयुक्त सेना से सालार मसूद को बहराइच में मार डाला।
1026-1054
1026 से 1054 ई.
भोजपुर नगर और भोजेश्वर मंदिर का निर्माण
भोपाल से 32 किमी दूर भोजपुर की स्थापना। विशाल सरोवर और अद्वितीय शिव मंदिर। 250 वर्ग मील का भोजताल।
1010-1055
पूरे शासनकाल में
84 ग्रंथ, भोजशाला, भोपाल नगर, 104 मंदिर
धार में भोजशाला। भोजपाल (भोपाल) नगर की स्थापना। 84 ग्रंथ। 500 विद्वानों की राजसभा। केदारनाथ पुनर्निर्माण।
1055
~1055 ई.
देहावसान — परमार वंश का सूर्यास्त
चालुक्य राजा भीम प्रथम और कलचुरी राजा कर्ण के संयुक्त आक्रमण के समय बीमारी से निधन। उत्तराधिकारी: जयसिंह/उदयदित्य।

♟️ सिंहासन बत्तीसी — राजा भोज और विक्रमादित्य की 32 पुतलियां

⚜ 32 पुतलियों के नाम — विक्रमादित्य के सिंहासन की 32 दिव्य मूर्तियां

01रत्नमंजरी
02चित्रलेखा
03चंद्रकला
04कामकंदला
05लीलावती
06रविभामा
07कौमुदी
08पुष्पवती
09मधुमालती
10प्रभावती
11त्रिलोचना
12पद्मावती
13कीर्तिमति
14सुनयना
15सुंदरवती
16सत्यवती
17विद्यावती
18तारावती
19रूपरेखा
20ज्ञानवती
21चंद्रज्योति
22अनुरोधवती
23धर्मवती
24करुणावती
25त्रिनेत्री
26मृगनयनी
27मलयवती
28वैदेही
29मानवती
30जयलक्ष्मी
31कौशल्या
32रानी रूपवती
📜 सिंहासन बत्तीसी की कथा: उज्जैन में एक किसान के खेत में एक विशाल सिंहासन मिला जिसके चारों ओर 32 पुतलियां थीं। राजा भोज ने पूजा की, सिंहासन उठ गया। जब राजा बैठने लगे तो पहली पुतली रत्नमंजरी हंसकर बोली — "राजन! इस पर बैठने के पहले विक्रमादित्य की एक कहानी सुनो।" इस प्रकार 32 पुतलियों ने 32 कहानियां सुनाईं और भोज की परीक्षा ली।

📖 महाराजा भोज — संपूर्ण जीवनी (5000 शब्द)

हाराजा भोज — भारतीय इतिहास का वह नाम जो एक साथ तलवार और कलम, दोनों चलाने में निपुण था। मालवा के परमार वंश के इस महान शासक ने अपने 45 वर्षों के शासनकाल (1010-1055 ई.) में वह सब किया जो किसी एक व्यक्ति के लिए लगभग असंभव लगता है। 84 ग्रंथों की रचना, भोपाल नगर की स्थापना, भोजपुर का अद्वितीय शिव मंदिर, धार की भोजशाला, केदारनाथ और सोमनाथ का पुनर्निर्माण, महमूद गजनवी को सिंध के रेगिस्तान में भगाना — ये सब एक ही महान विभूति के कार्य हैं। शेल्डन पोलॉक ने उन्हें "अपने समय का और शायद किसी भी भारतीय काल का सबसे प्रसिद्ध कवि-राजा और दार्शनिक-राजा" कहा है।

🌟 परमार वंश और राजा भोज का परिचय

परमारवंशीय राजाओं ने मालवा के नगर धार को अपनी राजधानी बनाकर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। परमार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने धार में 1000 ईस्वी से 1055 ईस्वी तक शासन किया। वे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के वंशज और इस वंश परंपरा के 11वें राजा थे। उनकी माता का नाम सावित्री और पिता का नाम सिंधुराज था। उनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो स्वयं एक विदुषी महिला थीं।

महाराजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। भोज के साम्राज्य के अंतर्गत मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उन्होंने उज्जैन की जगह अपनी नई राजधानी धार को बनाया। राजा भोज को उनके कार्यों के कारण 'नवसाहसाक' अर्थात् 'नव विक्रमादित्य' भी कहा जाता था। उनकी उपाधियां थीं: परम-भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर और त्रिभुवन नारायण।

⚔️ बाल्यकाल में सिंहासन और चारों दिशाओं में युद्ध

राजा भोज का जन्म लगभग सन् 980 में महाराजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैनी में हुआ। पंद्रह वर्ष की अल्पायु में जब वे सिंहासन पर बैठे, तो चारों दिशाओं से शत्रुओं का घेरा था। उत्तर में तुर्कों से, उत्तर-पश्चिम में राजपूत सामंतों से, दक्षिण में विक्रम चालुक्यों से, पूर्व में कलचुरी और पश्चिम में भीम चालुक्य से उन्हें लोहा लेना पड़ा। उन्होंने सब को हराया।

लगभग 1018 ईस्वी में भोज ने लाता क्षेत्र (वर्तमान गुजरात) पर आक्रमण किया और चालुक्यों को अधीन कर लिया। 1018-1020 के बीच उत्तरी कोंकण पर विजय प्राप्त की और 'कोंकण-ग्रहण विजय पर्व' का आयोजन किया। उदयपुर प्रशस्ति में कहा गया है कि भोज ने गुर्जर राजा, शाकंभरी चाहमान वीर्यराम और तिरहुत के गांगेयदेव को पराजित किया। दक्षिण में तेलंगाना के तेलप और तिरहुत के गांगेयदेव को हराने से ही वह प्रसिद्ध कहावत बनी — "कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली।" अर्थात महान और सामान्य की तुलना नहीं होती।

🏹 महमूद गजनवी पर आक्रमण और सोमनाथ का प्रतिशोध

गुजरात में जब महमूद गजनवी (971-1030 ई.) ने सोमनाथ मंदिर का ध्वंस किया, तो शैव भक्त राजा भोज बहुत क्षुब्ध हुए। तुर्की लेखक गरदिजी के अनुसार उन्होंने 1026 में गजनवी पर हमला किया और वह क्रूर हमलावर सिंध के रेगिस्तान में भाग गया। इसके बाद भोज ने हिंदू राजाओं की संयुक्त सेना एकत्रित करके गजनवी के पुत्र सालार मसूद को बहराइच के पास एक मास के युद्ध में मारकर सोमनाथ का बदला लिया।

तब 1026 से 1054 की अवधि के बीच भोपाल से 32 किमी पर स्थित भोजपुर शिव मंदिर का निर्माण करके मालवा में सोमनाथ की स्थापना कर दी। विख्यात पुराविद् अनंत वामन वाकणकर ने अपनी पुस्तक 'द ग्लोरी ऑफ द परमाराज आफ मालवा' में 'कोदंड काव्य' के आधार पर तुर्कों पर भोजराज की विजय की पुष्टि की है। कई मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों का कहना है कि सोमनाथ लूटने के बाद महमूद ने 'परम देव' नामक शक्तिशाली हिंदू शासक से टकराव से परहेज किया — आधुनिक इतिहासकार इसे भोज मानते हैं।

📜 84 ग्रंथों के रचयिता — बहुज्ञ विद्वान-राजा

राजा भोज खुद एक विद्वान होने के साथ-साथ काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे। मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे — धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र।

उनका समरांगण सूत्रधार वास्तुकला और प्रतिमा विज्ञान का अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें भवनों, किलों, मंदिरों, मूर्तियों और यांत्रिक उपकरणों के निर्माण का विस्तृत वर्णन है — जिनमें उड़ने वाली मशीन या ग्लाइडर का भी वर्णन है। युक्ति कल्पतरु में राज्य-प्रशासन, नगर-निर्माण, रत्न-परीक्षण, जहाज निर्माण आदि का विवरण है। राजमार्तंड पतंजलि के योग सूत्रों पर प्रमुख टीका है। सरस्वती-कंठभरण संस्कृत व्याकरण और काव्य का महान ग्रंथ है। 'भोज प्रबंधनम्' नाम से उनकी आत्मकथा भी है।

आईन-ए-अकबरी के अनुसार भोज की राजसभा में 500 विद्वान थे जिनमें नौ नवरत्न विशेष थे। हनुमानजी द्वारा रचित रामकथा के शिलालेख समुद्र से निकलवाकर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई गई जो हनुमान्नाटक के रूप में विश्वविख्यात है। विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेवराय ने स्वयं को 'अभिनव-भोज' और 'सकल-कला-भोज' कहा — यही उनकी महानता का प्रमाण है।

🏛️ भोज के निर्माण कार्य — मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर

मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक गौरव के जो स्मारक आज हमारे पास हैं, उनमें से अधिकांश राजा भोज की देन हैं। विश्वप्रसिद्ध भोजपुर मंदिर, उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर, धार की भोजशाला और भोपाल का विशाल तालाब — ये सभी राजा भोज के सृजनशील व्यक्तित्व की देन हैं।

राजा भोज नदियों को चैनलाइज या जोड़ने के कार्य के लिए भी विशेष रूप से पहचाने जाते हैं। उन्होंने भोजपुर में 9 नदियों और 98 धाराओं को तीन बांधों से जोड़कर 250 वर्ग मील से भी अधिक विस्तृत एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया। यह सरोवर 15वीं शताब्दी तक विद्यमान था। उन्होंने केदारनाथ, रामेश्वरम, सोमनाथ, मुण्डीर आदि मंदिर भी बनवाए। जैन लेखक मेरुतुंगा के अनुसार भोज ने अपनी राजधानी धारा में ही 104 मंदिरों का निर्माण करवाया था।

🏫 भोजशाला — तक्षशिला के बाद का महान विश्वविद्यालय

राजा भोज ने धार, मांडव तथा उज्जैन में 'सरस्वतीकण्ठभरण' नामक भवन बनवाए थे जिसमें धार में 'सरस्वती मंदिर' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। एक अंग्रेज अधिकारी सी.ई. लुआर्ड ने 1908 के गजट में इसका नाम 'भोजशाला' लिखा था। पहले इस मंदिर में माँ वाग्देवी की मूर्ति होती थी। मुगलकाल में मंदिर परिसर में मस्जिद बना दिए जाने के कारण यह मूर्ति अब ब्रिटेन के म्यूजियम में रखी है।

1960 से साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार का चिह्न भोजशाला की माँ वाग्देवी से लिया गया है। यह इस स्थान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का प्रमाण है। विद्वान मानते हैं कि देवी सरस्वती वसंत पंचमी के दिन यहीं प्रकट हुई थीं।

🕉️ धार्मिक आस्था — शिव भक्त राजा

ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि भोज शिव के प्रबल भक्त थे। उनके लेखन में शिव को "जगद्गुरु" (विश्व शिक्षक) के रूप में वर्णित किया गया है। उनके सभी शिलालेख शिव की स्तुति में लिखे गए श्लोकों से शुरू होते हैं। परमार शासकों के उदयपुर प्रशस्ति में कहा गया है कि भोज ने शिव के विभिन्न रूपों — केदारेश्वर, रामेश्वर, सोमनाथ, काल और रुद्र — को समर्पित मंदिरों से पृथ्वी को आच्छादित कर दिया था। वे शैव होते हुए भी सभी धर्मों के संरक्षक थे — जैन, बौद्ध और वैष्णव सभी को उनसे आदर मिला।

⚜ सिंहासन बत्तीसी — भोज और विक्रमादित्य की किंवदंती

सिंहासन बत्तीसी (सिंहासन द्वात्रिंशिका) में भोज को विक्रमादित्य का सिंहासन मिलता है। उज्जैन में एक किसान के खेत में मचान बनाने पर वह अचानक चिल्लाने लगता था — "राजा भोज को पकड़ लाओ।" खुदाई में एक विशाल सिंहासन मिला जिसके चारों ओर 32 पुतलियां थीं। राजा भोज ने पूजा की, सिंहासन उठ गया। 32 पुतलियों ने बारी-बारी 32 कहानियां सुनाईं — विक्रमादित्य की महानता की — और जब भोज ने स्वीकार किया कि विक्रमादित्य उनसे भी महान थे, तभी उन्हें सिंहासन पर बैठने की अनुमति मिली।

⚔️ अंतिम वर्ष और निधन

भोज के शासनकाल के अंतिम वर्षों में चालुक्य राजा भीम प्रथम और कलचुरी राजा कर्ण ने संयुक्त रूप से मालवा पर आक्रमण किया। मेरुतुंगा के अनुसार भोज की मृत्यु उसी समय एक बीमारी से हुई जब सहयोगी सेना ने उनके राज्य पर आक्रमण किया। लगभग 1055 ई. में महाराजा भोज का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद धीरे-धीरे परमार साम्राज्य कमजोर होता गया। उनके उत्तराधिकारी उदयदित्य (भाई) और जयसिंह थे।

मालवा के इस चक्रवर्ती, प्रतापी, काव्य और वास्तुशास्त्र में निपुण और विद्वान राजा, राजा भोज के जीवन और कार्यों पर विश्व की अनेक यूनिवर्सिटीज में शोध कार्य हो रहा है। उनका नाम आज भी इसलिए जीवित है क्योंकि उन्होंने एक ऐसी विरासत छोड़ी जो तलवार से बने किसी साम्राज्य से कहीं अधिक टिकाऊ है — ज्ञान, शिल्प, और संस्कृति की विरासत। जब भी कोई भोपाल की खूबसूरत झील देखता है, जब भी कोई भोजपुर के अधूरे मंदिर की भव्यता देखकर अचंभित होता है, जब भी कोई भोजशाला के इतिहास को पढ़ता है — तब राजा भोज जीवित हो उठते हैं।

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