आदिवासी लोकोत्सव के रूप में मनाते है: करमा नृत्य
करमा नृत्य बुंदेलखण्ड में बैंगा, भूमियाँ, काँवर और गौड़ आदिवासी अपने साधारण वाद्य ठुमरी, पायरी, छल्ला और झुमकी की संगत में प्रस्तुत करते हैं। करमा नृत्य बुन्देलखण्ड में ही नहीं, छत्तीसगढ़ के गौड़ और बैंगा, मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिम सीमा के उराओं में भी बहुत प्रचलित है। आदिवासियों में प्रचलित मनोरंजन के साधनों के सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि करमा नृत्य भारत के विभिन्न भागों में बसे हुये समस्त आदिवासियों में प्रचलित है। यह नृत्य फसल की उत्पत्ति विशेष करमा पर्व बिझावर और मझवार आदिवासी लोकोत्सव के रूप में मनाते है।
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Loknritya Karma Nritya |
रहस (ब्रज की रासलीला से प्रभावित बुन्देली लोकनाट्य)
यह नृत्य धानरोपनी के कठिन श्रम और कटनी के दिनों की परेशानियों के बीच के अवकाश कार्य का सूचक है। जिसे एक तरह से अधिक उत्पादन के हेतु पकती हुई फसल की कामना के लिये किया जाने वाला पर्व कहा जाना उचित है। शरतचन्द्र राय का कथन है कि इस अनुष्ठान का केन्द्रीय तत्व करम वृक्ष की तीन शाखों को काटकर लाने (गौड़ आदिवासी कलमी या गलदू नामक पेड़ की डालियाँ जंगल से लाते हैं) और उन्हें अखाड़ा या नाच के मैदान में गाड़ने से संबंधित है। शाखाओं को ’करम राजा’ की संज्ञा दी जाती है। जब शाखायें काटकर लाई जाती हैं, तो उनके साथ युवक आदिवासी नृत्य करते आते हैं। डालियां गाड़ देने के बाद सारी रात राजा के आस-पास करमा नृत्य किया जाता है। दूसरे दिन प्रातःकाल उन शाखाओं पर हार चढ़ाये जाते हैं और ’करम’ संबंधी कथा गायी जाती है। तत्पश्चात् फूल चढ़ाये जाते हैं और करम राजा को दही और चावल का भोग दिया जाता है। अनाज से भरी हुई टोकनियाँ भी शाखाओं के आगे रखी जाती हैं तथा अनुष्ठानिक रूप से उगाये गये जौ के पौधे लड़के और लड़कियों को बाँटे जाते हैं, जिन्हें वे अपने बालों में खोंसते हैं। इसके बाद ’करम राजा’ की आशीष प्राप्त की जाती है। शाखाओं को उठाकर स्त्रियाँ गाँव की परिक्रमा करती हैं।
स्वांग (बुन्देलखण्ड तथा अन्य अंचलों का अत्यंत प्रसिद्ध लोकनाट्य)
इसके अनेक भेद हैं- जैसे लहकी, थापी, झूमर या बेगानी झूमर, खलहा या झुलनियाँ सिरकी, घटवार, एक-तारिया, पेडेहर, दोहारी और तेगवानी करमा आदि।
करमा लोकनृत्य को धार्मिक दृष्टि से देखा जाय, तो यह भगवान श्री कृष्ण की लीला-पूजा का भी सूचक है, क्योंकि वर्षा के अधिपति घनश्याम की पूजा में यह विशेष रूप से नाचा जाता है। कदम्ब (करम) नामक पेड़ की शाखा को हाथ में लेकर नर्तक इस नृत्य को आज भी करते हैं। उनके नृत्य वृन्दावन की रासलीला का स्मरण कराते हैं। करमा संबंधी एक गीत का एक अंश यहाँ प्रस्तुत है-
’या चोला का मत करो गुमान, बचाने वाला कोई नइयाँ रे।
कोड़ी-कोड़ी माया जोरै, हो गई लाख करोर,
निकर प्राण बाहर हो गये, मिचका-मिचका होय .....।
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