शैला नृत्य आदिवासियों द्वारा डंडो की सहायता से उसी प्रकार नाचा जाता है जैसे कि सरगुजा, दिन्दवाड़ा और बैतूल में नाचा जाता है। मगर वहाँ इसे ’डंडा नाच’ या ’डंडार पाटा’ कहा जाता है। शैला नृत्य के हरौला शैला, भरोला शैला, शुलनियां सिकार शैला, अटारी शैला, लहकी, बैठक आदि विविध प्रकार हैं। कुछ रूपों में हँसी-मजाक से भरी भंगिमायें भी देखने में आती हैं।
शैताम नृत्य (बुन्देलखण्ड लोकनृत्य)
कभी-कभी नर्तक अपने सामने वाले व्यक्ति का सहारा लेकर एक चंग में गोलाकार में खड़े हो जाते हैं फिर वे गोलाई में सामूहिक रूप से विभिन्न व्यायामात्मक क्रियायें करके, उछलते हुये घूमने लगते हैं। कभी-कभी वे जोड़ों में बँट जाते हैं- अथवा एक या दो पंक्तियों में विभाजित होकर नृत्य करते हैं। यह भी होता है कि नृत्य में वे एक-दूसरे की पीठ पर चढ़ने की कोशिश भी करते हैं। शैला नृत्य की परिणति सर्प नृत्य के रूप में होती है और इसका सरल रूप दशहरा नृत्य में देखा जा सकता है, जो दिवाली के पहले बेंगा जातियों द्वारा नाचा जाता है। शैलागीत ’नानाना रे नानाना’ की नीरस टेक पंक्ति वाले होते हैं जो कि आमतौर पर नाचते समय परिवर्धित किये जाते है। कभी-कभी इनमें बेहद फूहड़ता भी प्रदर्शित हो जाती है।
एक गीत उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत है-
तर हर नाना तरिहा रे तरिहरि है नाना।
कारवर डेरा डीह डोगर।
कारवर कोइल कछार।
कारवर है अमरइया, कावर पभर दुवारा।
सिंहा के डेरा अमरइया।
डेरिहा परम दुआर।
आपका Bundelkhand Troopel टेलीग्राम पर भी उपलब्ध है। यहां क्लिक करके आप सब्सक्राइब कर सकते हैं।
0 टिप्पणियाँ