झांसी में खेती के मौसम के साथ पराली जलाने का मुद्दा फिर सामने आ गया है। प्रशासन ने खेतों पर नजर रखने के लिए आधुनिक तकनीक अपना रखी है, जिसमें सेटेलाइट से जानकारी तुरंत मिल जाती है। इसके बावजूद कई किसानों ने अपने खेतों में पराली जलाई और इससे प्रशासन की चिंता बढ़ गई। पराली जलाने का संदेश सेटेलाइट से आते ही नियंत्रण कक्ष तक पहुंच जाता है, लेकिन इसके बाद भी कई बार टीम मौके तक समय पर पहुंच नहीं पाती।
रात में आती सूचनाएं, कार्रवाई में होती मुश्किल
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सेटेलाइट से आने वाले संदेश अक्सर देर रात मिलते हैं। ऐसे में तत्काल मौके पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। पराली जलाने की घटनाएं रात में ही ज्यादा होती हैं, इसलिए कई मौके हाथ से निकल जाते हैं। इसके बाद, सुबह या दिन में टीम को भेजकर जांच कराई जाती है और संबंधित किसानों पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होती है।
ग्राम स्तरीय टीमें होंगी अब और सक्रिय
अधिकारियों ने अब गांव स्तर पर निगरानी बढ़ाने का निर्णय लिया है। स्थानीय टीमों को निर्देश दिया गया है कि वे खेतों पर लगातार नजर रखें और पराली जलाने की किसी भी घटना की तुरंत सूचना दें। प्रशासन का मानना है कि स्थानीय स्तर पर सतर्कता बढ़ने से ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। इसके साथ ही किसानों को समझाने की भी कोशिश की जा रही है कि पराली जलाना केवल नियमों का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि उनके खेतों और फसलों के लिए भी नुकसानदायक है।
किसानों पर होगी कार्रवाई
जिन किसानों ने पराली जलाई है, उनसे जुर्माना वसूला जाएगा। विभाग का कहना है कि लगातार समझाने और जागरूकता के बावजूद यदि कोई पराली जलाता है, तो कानूनन कार्रवाई जरूरी है, ताकि आगे ऐसी घटनाएं कम हों।
पराली जलाने से खेत और पर्यावरण दोनों को नुकसान
कई किसान फसल कटने के बाद खेत में बचे अवशेषों को जलाकर अगली फसल की तैयारी जल्दी करना चाहते हैं। लेकिन ऐसा करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होती है, जमीन का जैविक संतुलन बिगड़ता है और धुआं हवा को भी जहरीला बनाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मशीनों और आधुनिक तरीकों से अवशेषों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अब भी पराली जलाने की परंपरा जारी है।

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